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बारिश थमने के बाद भी स्टेडियम में एक अजीब सी खालीपन की भावना थी। सभी खिलाड़ी मैदान से हट चुके थे, लेकिन अर्जुन वहीं बैठा था, अपने जूते की किताब पढ़ते हुए।
मैंने उससे पूछा, "मापदंड के बिना लगी यह लड़ाई कैसा था?" वह मुस्कुराया और बोला, "खेल मैदान पर ज़रूरी नहीं कि हर मुकाबला जीत से ही खत्म हो। कभी-कभी यह खुद को जानने का तरीका होता है।"
अर्जुन ने बताया कि वह कहीं हारे नहीं, बल्कि उसने जानने की कोशिश की कि हार और जीत के बाहर भी खेल का मतलब होता है। पिछले कुछ महीनों में वह नए खिलाड़ियों की मदद करता रहा, उनकी गलतियों को समझाता रहा। उसी प्रक्रिया में उसने अपनी कमजोरी भी पहचानी।
स्टेडियम की चुप्पी में मुझे यह एहसास हुआ कि खेल सिर्फ गेंद और दौड़ नहीं, बल्कि अनुभव और सीख का वह सागर है जिसमें हम कभी डूबते हैं, कभी तैरते हैं। अर्जुन की ये अनसुनी जीत, उसके अंदर की दुनिया से जुड़ी थी, जो शायद जताई नहीं जाती।
मैंने सोचा, शायद यही खेल की असली खूबसूरती है—जहां बाहर का शोर कुछ खास नहीं, और अंदर की लड़ाई सबसे बड़ी होती है। अर्जुन की चुप्पी में छिपी इस जीत को समझना मेरे लिए एक नई सीख थी।
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