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देश के कोने में बसे छोटे से गाँव में, मैं अकेले ही एक लंबी यात्रा पर था। चारों ओर ऊँचे पहाड़ थे, जिनकी चोटी पर बर्फ जमी हुई थी। वहां की ठंडी हवा और सन्नाटा कुछ अलग ही अनुभव दे रहे थे।
मैंने कभी नहीं सोचा था कि इस शांतिपूर्ण स्थान पर इतनी अजीब सी गोपनीयता होगी। रास्ते में एक पुराना कुटिया दिखी, जिसमें दरवाज़े पर ताले लगे थे। शायद सालों से कोई नहीं आया। मेरी जिज्ञासा बढ़ गई, और मैं पास जाकर धीरे से खिड़की से झांका।
भीतर से एक संगीत की मधुर धुन सुनाई दी। उस अंधकार में एक बूढ़ा आदमी बैठा था, जो अपने पुराने सितार पर गीत बजा रहा था। उसने मेरी उपस्थिति महसूस करते ही मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ भी खोजो, कहीं न कहीं सुर वैसे ही छिपे रहते हैं।”
मैंने उससे पूछा, वह संगीत क्यों बजाता है, जब कोई सुनने वाला नहीं होता। उसने उत्तर दिया, “यहाँ की नींद और ख़ूबसूरती का ये अपना एक तरीका है, जिससे जीवन चलता रहता है। कभी-कभी, सुनने वालों की ज़रूरत नहीं होती, बस बजाओ।”
उस दिन मैंने जाना कि यात्रा हमेशा मंज़िल तक पहुंचना नहीं होती, बल्कि रास्ते की वह खामोशी और अनजानी कहानियाँ भी आंतरिक शांति बनाती हैं। मैं उस जगह से लौटते समय हृदय में एक अजीब सी तृप्ति लेकर गया, जिसका कोई ठोस कारण मैं समझ नहीं पाया।