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मेरी दिनचर्या में अचानक कुछ अजीब हो गया है। हर सुबह मैं जल्दी उठता हूं, चाय बनाता हूं और बालकनी में जाकर बाहर की ठंडी हवा महसूस करता हूं।
लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से, जब मैं खिड़की खोलता हूं, तो सामने वाले घर की बिल्ली मुझे गुस्से से देखती है। मैं उसे भला बुरा कहने की बजाय थोड़ा डर जाता हूं। कभी-कभी लगता है कि वह मुझे रोकने की कोशिश कर रही हो।
मेरी मुलाकात उस बिल्ली से तो नहीं हुई है, लेकिन उसकी नजरें कुछ कह रही हैं। क्या वह सचमुच गुस्सा है या बस मेरा ध्यान खींचने की कोशिश कर रही है? मैंने इस पर ज्यादा सोचना छोड़ा, लेकिन मन में उलझन रहती है।
इस अजीब सा अनुभव से मैं खुद से ये सवाल पूछने लगा कि हम रोज़ के छोटे-छोटे पल क्यों नजरअंदाज कर देते हैं? वे हमें ध्यान से जीना सिखा सकते हैं, बस जरूरत है थोड़ा रुककर देखने की।
कभी-कभी, मेरे लिए यह नियति की तरह है कि बिल्ली की नजरें मेरी सुबह की शुरूआत बन गई हैं, बिना किसी बड़ी वजह के। यह कोई बड़ी कहानी नहीं है, बस एक शांत और रहस्यमय हिस्सा मेरी रोज़ की ज़िन्दगी का, जो शायद कभी समझ में आए या न आए, बस महसूस होती रहे।
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