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राहुल की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। वह एक अजीब सी जगह पर था, चारों ओर केवल छाया और ठंडी हवा थी। अचानक, उसे याद आया कि वह उस पहाड़ पर ट्रैकिंग के दौरान कहाँ खो गया था।
दिन भर वह चट्टानों और झरनों के बीच घूमता रहा, लेकिन अब रात हो गई थी और अंधेरा उसके चारों ओर फैल चुका था। न तो कोई सहायता थी, न ही मोबाइल की पैठ। राहुल को एहसास हुआ कि उसे उस जंगल के आसपास एक सुरक्षित जगह ढूंढ़नी होगी।
वह पहाड़ की तलहटी में आगे बढ़ा। कुछ देर बाद उसने एक गुफा देखी। ठंडी हवा अंदर से आ रही थी, लेकिन वह इतनी दूर जाकर वापस भी नहीं जा सकता था।
गुफा के अंदर, राहुल ने पुराने पत्ते और डंडे इकट्ठे किए, ताकि आग जलाई जा सके। रात भर वह आग की चिंगारी देखते हुए मन ही मन अपनी हिम्मत बढ़ाता रहा। अजीब सी आवाजें आती रहीं, पर उसने डरने की बजाय इसका सामना किया।
सुबह जब सूरज निकला, तो राहुल ने आस-पास के रास्ते का ध्यान से निरीक्षण किया। उसे पता चला कि वह गुफा से कुछ दूर एक गाँव था, जो मुकाबले में बहुत दूर नहीं था।
अगले कुछ घंटों में, राहुल ने धीरे-धीरे उस गाँव का रास्ता पकड़ लिया। वह अनुभव अपने भीतर एक अनूठी झलक दे गया था – डर, अकेलापन, और फिर अंत में खुद पर भरोसा।
हालांकि यह कहानी किसी आम साहसिक सफल वापसी की तरह समाप्त नहीं हुई, पर राहुल के लिए यह रात हमेशा एक यादगार और गहरी सीख बनी।
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