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सुबह सुबह, रिया ने निक्कर और टी-शर्ट पहनी और अपने गाँव के पुराने खेल मैदान की ओर चल पड़ी। आसमान साफ़ था और हवा हल्की ठंडी। खेल कहीं दूर लग रहा था, लेकिन आज कुछ अलग था।
रिया ने धीरे-धीरे मैदान पर जाकर देखा कि वहां कुछ बच्चे गेंद के साथ खेल रहे थे। पर आज वे आम खेल नहीं खेल रहे थे। वे हँसते-खेलते एक अजीब सी दौड़ कर रहे थे जहाँ सभी को एक ही समय में कूदना होता था।
रिया ने हंसते हुए सोचा, "यह तो मज़ेदार है। क्यों न मैं भी खेल में शामिल हो जाऊं?" उसने बच्चों से पूछा कैसे खेलना है। बच्चों ने खुशी से समझाया।
खेल शुरू हुआ। पहला प्रयास में रिया असंतुलित होकर गिर गई। वह थोड़ा शर्मिंदा हुई, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उसने फिर से कोशिश की। हर बार वह थोड़ी बेहतर हुई।
खेल का मकसद केवल जीतना नहीं था, बल्कि सही समय पर सहयोग करना था। रिया ने महसूस किया कि यह खेल उसे ना केवल दौड़ने बल्कि सोचने में भी मदद कर रहा है।
जब सूरज उगने लगा, रिया ने मैदान छोड़ा। वह थकी हुई थी, लेकिन आनंदित भी। उसे पता था कि अगली सुबह फिर से खेल के इस नए तरीके को खेलने आएगी। ऐसे छोटे-छोटे अनुभव उसकी जिंदगी को रंगीन बना रहे थे।
शायद खेल केवल शरीर की ताकत नहीं, बल्कि दिमाग और दिल की भी कसरत है। और यह सोचकर रिया ने मुस्कुराते हुए घर की ओर कदम बढ़ाए।
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