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संध्या रोज़ काम के बाद घर लौटती तो बहुत थक जाती। उसकी नौकरी में बहुत दबाव था, और उसे लगता था कि उसका दिमाग बहुत व्यस्त रहता है।
एक दिन, वह पार्क में गई। वहां एक व्यक्ति अपनी छोटी सी ढोलक बजा रहा था। संगीत की थाप सुनकर संध्या ने रोककर सुना। धुन में कुछ खास था - जैसे हर एक धड़कन उसके दिल की उलझनों को साफ़ कर रही हो।
संध्या ने उस व्यक्ति से पूछा, "आप दिन भर तनाव में रहते हुए भी इतने खुश कैसे रहते हो?"
ढोलक बजाने वाले ने मुस्कुराते हुए कहा, "जब मैं संगीत बजाता हूं, तो मेरी सारी चिंताएं कहीं दूर चली जाती हैं। यह मेरे लिए ध्यान करने जैसा है। आप भी कोशिश करो।"
संध्या ने सोचा कि उसे रोज कम से कम दस मिनट संगीत के साथ बिताना चाहिए। उसने घर जाकर अपने पुराने गिटार को निकाला और थोड़ा-थोड़ा बजाने लगी।
हालांकि वह अच्छी नहीं थी, फिर भी संगीत ने उसके दिन को कुछ शांत बनाया। उसने जाना कि सिर्फ व्यायाम या दवाइयां ही नहीं, दिल और दिमाग को आराम देने वाले छोटे-छोटे पल भी जरूरी हैं।
हर दिन की भाग-दौड़ के बीच, संगीत उसे एक नया तरीका दिखाने लगा था, जिससे वह तनाव को सह सकती थी।
शायद तनाव कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता, पर संगीत की मदद से उसे समझना आसान हो गया कि उसे कैसे संभालना है।
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