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मैं अनुज हूँ। अक्सर मैं शाम को अपने घर के पास वाले बगीचे में बैठता हूँ। वहां बहुत सारे पेड़ हैं। आज शाम कुछ अलग था।
हवा धीरे-धीरे चल रही थी। पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही थीं, लेकिन एक पेड़ की पत्तियाँ बिलकुल नहीं हिल रही थीं। मुझे यह अजीब लगा। मैंने पास जाकर देखा तो उस पेड़ पर एक छोटा सा घोंसला था।
घोंसले में से हल्की सी आवाज आ रही थी, लेकिन कोई पक्षी बाहर नहीं दिखा। मैं बैठ गया और ध्यान से सुनने लगा। अचानक हाथ में पत्तियाँ गिरने लगीं। मैं चौंका, लेकिन आस-पास कोई नहीं था।
मेरी दादा ने कहा था कि पेड़ भी जीते हैं और उनकी अपनी बातें होती हैं। मैंने सोचा, क्या शायद यह पेड़ मुझसे कुछ कहना चाहता है?
मैं बगीचे में देर तक बैठा रहा, पेड़ के नीचे। शाम धुंधली होने लगी। पतझड़ के रंग आसमान में फैलने लगे।
मैंने उस पेड़ को धन्यवाद कहा कि उसने मुझे शांत रहने और प्रकृति को सुनने का मौका दिया। मैं समझ गया कि सब चीज़ें अपनी जगह पर खास होती हैं, भले ही हम उसे तुरंत न समझ पाएं।
इस अनुभव ने मुझे यह महसूस कराया कि कभी-कभी हमें कुछ भी न करना चाहिए, केवल बैठकर चीज़ों को महसूस करना चाहिए। जीवन में कुछ सवाल बिना जवाब के भी रहने चाहिए।