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अर्जुन को खेल का बहुत शौक था, खासकर बैडमिंटन में। उसके शहर में एक बड़ा मैच होने वाला था। सभी बच्चे तैयारी में लगे थे।
मेज़ पर पंखे की आवाज़ थी, और कोर्ट की रोशनी थोड़ी धीमी थी। अर्जुन ने देखा कि उसकी गेंद तेज़ नहीं जा रही थी। वह सोचने लगा कि क्या उसकी रैकट ठीक से काम नहीं कर रही?
मेरे दोस्त ने कहा, "क्या तुम्हें नई रैकट मिल सकती है?" लेकिन अर्जुन के पास पैसे नहीं थे। वह परेशान हो गया कि कैसे मैच खेले।
अर्जुन ने फिर सोचा, "मुझे अपनी ताकत और चालाकी से खेलना चाहिए। गेंद की ताकत से नहीं।" उसने अपने हाथ और पैरों की गति पर ध्यान दिया। हर शॉट में वह ज़्यादा ध्यान देने लगा।
मैच शुरू हुआ और अर्जुन ने धीरे-धीरे अपने खेल से प्रभावित किया। वह तेज़ था, लेकिन ज्यादा ताकत का इस्तेमाल नहीं करता था। विपक्षी खिलाड़ी चौंक गया।
खेल पूरा होने पर अर्जुन ने हार-जीत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसने यह महसूस किया कि खेल में मज़ा और अपनी क्षमता दिखाना ज़्यादा महत्वपूर्ण था।
वह जानता था कि अगली बार नई रैकट के साथ वह और बेहतर कर सकता है, लेकिन आज के खेल ने उसे कुछ नया सिखाया था।
यह कहानी हमें बताती है कि कभी-कभी हमारे पास जो होता है, उसका बुद्धिमानी से उपयोग करना सबसे अच्छा होता है। ऐसे क्षण खेल को और रोमांचक बनाते हैं।
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