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साजन अपनी छोटी सी छत से शहर का नज़ारा देख रहा था। आज दीवाली का दिन था, लेकिन साजन के मन में कुछ अलग ही विचार थे।
हर साल वह त्योहार देखकर खुश होता, लेकिन इस बार उसे लगा कि सब जल्दी-जल्दी काम कर रहे हैं और एक-दूसरे से कम बातें कर रहे हैं। घर में रोशनियाँ थीं, पर सब खामोश थे।
साजन ने सोचा, "क्या यह त्योहार सिर्फ रोशनी और मिठाईयों से ही बना है?" वह बाहर निकला और मोहल्ले में चला। लोग तेज़ चल रहे थे, और कोई मुस्कुराता नहीं दिखा।
एक बूढ़े आदमी ने उसे देखा और मुस्कुराकर कहा, "तेज मत चलो, कुछ बातें सुनो।" साजन ने रुककर उनके पास बैठना चुना। बूढ़े ने पुरानी यादें सुनाईं कि कैसे त्योहार में लोग एक-दूसरे के घर जाते थे, हँसते और बातें करते थे।
साजन ने खुद सोचा, "शायद मैं भी कुछ बदल सकता हूँ।" उसने अपने पास के दोस्तों को फोन किया और शाम को सबने छोटी-छोटी बातें की। मिठाई बाँटी और थोड़ी हँसी आई।
दिन खत्म होते-होते, साजन ने महसूस किया कि त्योहार का असली मतलब है साथ में समय बिताना, ना कि सिर्फ चमक-दमक। लेकिन फिर भी, वह बदलाव धीरे-धीरे हो सकता है। त्योहार सिर्फ एक दिन का नहीं, बहुत दिन तक चलता है, जब हम दिल से जुड़े हों।