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सुबह जल्दी सुमित्रा अपने छोटे गाँव में उठी। आज त्योहार था, और गाँव में हर तरफ रंग और चमक थी। सुमित्रा ने सोचा कि वह अपने घर के बाहर फूल सजाएगी।
जैसे ही वह बाहर गई, देखा कि उसके बगल के घर की दीवार पर गंदी पेंटिंग हो गई थी। वह थोड़ी अजीब लगी, क्योंकि त्योहार के दिन किसी को भी ऐसे काम पसंद नहीं आते।
गाँव के लोग जल्दी-जल्दी अपने-अपने काम में लगे थे। सुमित्रा ने सोचा कि शायद कोई बच्चा गलतफहमी में ऐसा किया होगा। उसने आसपास के बच्चों से पूछा, लेकिन सबने कुछ नहीं कहा।
थोड़ी देर बाद, गाँव के सबसे पुराने आदमी ने कहा, "यह पुरानी दीवार है, और यह रंग कुछ स्थानी कलाकार ने किया है। यह कला है, जो त्योहार की रौनक बढ़ाती है।"
सुमित्रा ने उस दीवार को ध्यान से देखा। पेंटिंग में रंगों और रूपों का अनोखा खेल था। उसने महसूस किया कि कभी-कभी हम बदलाव को तुरंत नहीं समझ पाते।
दिन खत्म होने को था और त्योहार की आतिशबाजी शुरू हुई। सुमित्रा ने अपनी नज़र उस बाकी सब पर भी डाली, जो उसने पहले नहीं देखा था। हर छोटी चीज़ में कुछ खास होता है, बस उसे जानने की जरूरत होती है।
त्योहार की रौनक सिर्फ रंगों या सजावट में नहीं, बल्कि सोच और समझ में भी होती है। सुमित्रा ने उस दिन सीख लिया कि अलग नजरिए से देखने पर नई चीजें मज़ेदार लगती हैं।
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