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राकेश एक मध्यम उम्र के आदमी हैं। वह रोज़ सुबह जल्दी उठते हैं और अपने घर के बगीचे में थोड़ा समय बिताते हैं।
आज सुबह, राकेश को हल्की सी ठंड लगी, लेकिन उन्होंने सोचा, "यह कुछ खास नहीं है।" वह हँसते हुए अपनी चाय पीने बाथरूम गए।
जब वह दर्पण में खुद को देख रहे थे, उन्होंने ध्यान दिया कि उनकी आंखें थोड़ी लाल हो गई हैं और गला सूजा हुआ महसूस हो रहा है। राकेश को थोड़ी चिंता हुई।
पर वे डरने की जगह हंसी आए। उन्होंने कहा, "क्या ये मेरी आँखें हँस रही हैं या गला खींच रहा है?"
राकेश ने खुद से वादा किया कि वे आज थोड़ा आराम करेंगे और ज्यादा पानी पीएंगे। दिन के समय वे बगीचे में चलने गए, लेकिन बहुत जोर से नहीं।
रात को, जब वे सोने जा रहे थे, तो उन्होंने महसूस किया कि गला थोड़ा कम सूजा है और आँखें भी थोड़ा शांत हैं। वह मुस्कुराए और सोचें, "शायद मेरी हंसी भी मेरी दवा है।"
राकेश की कहानी बताती है कि कभी-कभी हम छोटी-छोटी बातों पर डरते हैं, पर एक हँसी और अच्छा ध्यान रखने से दिन भी अच्छा बन सकता है।
शायद कल सब कुछ और बेहतर होगा, या फिर नहीं, लेकिन आज का दिन हँसता हुआ था।